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विलुप्त होती ‘गौरया’ के लिए ‘वी वंडर फाउण्डेशन’ कर रही वंडरफुल कार्य
September 16, 2020 • मनोज कुमार • जनसंदेश एक्सक्लूसिव

गौरया संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभा रही संस्था नें बांटे अबतक 5200 घोंसले 

वेस्ट मैटेरियल से तैयार आकर्षक घोंसले को बांटती है संस्था

संस्था के प्रयासों से कई घरों में गौरया ने डाला डेरा

मनोज कुमार
वाराणसी। कभी घर के छत की मुंडेर पर तो कभी आंगन में तो कभी पेड़ की डाल पर बैठी गौरेया की चहचहाट से होती हमारी सुबह ना जाने कब गुम हो गई। दिन प्रतिदिन घटती गौरया की संख्या हमें कई तरह से प्रभावित किया है, परोक्ष या अपरोक्ष रूप से हमेशा से इंसानों की दोस्त माने जाने वाली गौरेया आज गिनती की संख्या में ही बची हुई है। यह कहना है कि वी वंडर फाउण्डेशन के अध्यक्ष गोपाल कुमार का। 

मुख्य रूप से विलुप्त प्रायः पक्षी गौरया के बचाव के लिए कार्य कर रही वी वंडर फाउण्डेशन के अध्यक्ष का कहना है कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गौरया हमारे घरों में सुख समृध्दि की प्रतीक होती थी। आंगन में इनकी चहचहाट से बुझे चेहरे खिलखिलाने लगते है, लेकिन गौरया की महत्ता सिर्फ यही तक नहीं है, हमारी फसलों को टिड्डियों से बचाने और उनको सुरक्षित रखने में भी इनका अहम योगदान रहता है। 

उन्होंने बताया कि गौरया एक कीटभक्षी प्राणी है, जो खेतों में छोटे-छोटे टिड्डियों को बड़े चाव से चट कर जाती है, ऐसे में देखा जाये तो छोटी सी गौरया किसानों के फसलों की रक्षा करने में भी सक्षम होती है। उन्होंने बताया कि सन् 2017 से इनकी संस्था कार्य कर रही है, शुरू में इन्होंने चाइल्ड एजुकेशन, महिला जागरूकता के साथ अन्य कई मुद्दों पर काम किये। चंदौली के धानापुर के निवासी गोपाल बताते हैं कि ग्रामीण पृष्ठभूमि का होने के नाते बचपन से ही वें गांव में गौरया की महत्ता को सुनते आ रहे है, फिर अचानक साथियों से वार्ता के दौरान गौरया संरक्षण पर कार्य करने का इनका मन आया, जिसके बाद से ही ये लगातार गौरया संरक्षण को लेकर जागरूकता कार्यक्रम कर रहे है। 

उन्होंने बताया कि उनकी संस्था ने अब तक 5200 से अधिक घोसलें वितरित कर चुकी है। जिसका परिणाम भी उनको देखने को मिला। कई घरों में लगे घोंसलों में गौरया ने अपना ठिकाना बनाया है। बताया कि घोंसला बनाने के लिए उनकी संस्था वेस्ट मैटेरियल का प्रयोग करती है, जैसे शादी के कार्ड, खाली पड़े कार्टून, खाली बोतलें और अन्य कई चीजों को आकर्षण ढंग से सजाकर उसका घोंसला बनाते है। 

उन्होंने बताया कि उनकी संस्था को इस दिशा में बेहतर कार्य करने के लिए नेशनल प्राइड अवार्ड भी मिल चुका है। इसके साथ ही समय-समय पर कई सामाजिक संस्थाओं व अन्य संगठनों द्वारा उनकी संस्था को सम्मानित किया जाता रहा है। गौरया संरक्षण की दिशा में इनकी संस्था ने अब तक 70-80 कार्यशालायें आयोजित करने के साथ ही 5200 घोंसलें वितरित कर चुके है। इसके साथ ही गौरया संरक्षण की दिशा में इन्होंने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है, जिसकी मदद से कही भी अवैध तस्करी के संबंध में जानकारी मिलने पर वें वहां गौरया की मदद करने पहुंच जाते है। 

उन्होंने बताया कि बनारस के ही बहेलिया टोला में 5-6 हजार पक्षियों के होने की जानकारी मिलने पर इन्होंने प्रशासन की मदद से सभी पक्षियों को आजाद करवाया था। बढ़ते कंक्रीट के जंगल और रेडिएशन गौरया के विलुप्त होने में प्रमुख भूमिका निभा रहे है, जिसके लिए इन्होंने केन्द्र सरकार व स्वास्थ मंत्रालय को पत्र लिखकर 5-जी लांचिंग पर रोक लगाने की मांग की है, जिससे रेडिएशन की चपेट में आने से गौरया की मौत ना हो सके। बताया कि इनकी संस्था गौरया संरक्षण के साथ-साथ हर समसामयिक मुद्दे पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती रहती है। 

20 मार्च को मनाया जाता है विश्व गौरया दिवस
हर साल 20 मार्च को विश्व गौरया दिवस मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत 2010 में हुई। घर में सुख समृध्दि की प्रतीक गौरया के अचानक विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने पर जागरूकता को लेकर इस दिवस को मनाने की शुरूआत हुई।