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समाज में बढ़ती दुराचारी मानसिकता 
August 21, 2020 • जनसंदेश न्यूज • जनसंदेश एक्सक्लूसिव


वैसे तो समाज के विभिन्न विषयों पर निरन्तर अपने कलम के माध्यम से मनः वेदना प्रकट करती रही हूँ पर जब जब किसी घटना को लेकर स्त्री के प्रति समाज के दुराचारी भाव को पढ़ती हूँ तो अंदर से आत्मा कांप उठती है। मन में अजीब सा हलचल पैदा होता है। हम कहाँ है आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में हम जिससे भयभीत है, वह तो हमारे आसपास ही है। एक जेंडर के रूप में जिसे हम रिश्तो नातों परिचितों, अपरिचितों, सहकर्मियों, पड़ोसियों या रावण की तरह हठात अपहरण कर स्त्री अस्मिता को तार-तार कर देने वाले जाने अनजाने चेहरे होते है, मैं इन्हें किसी नाम मे न बांधकर एक मानसिक विकृत कुंठित पुरुष प्रधान समाज में जहां चारों और दरिंदें, वहशी जो क्षद्म रूप धरे व्यक्ति से व्याप्त हों, उस समाज में स्त्री की स्थिति दिन प्रतिदिन दयनीय हो जाना स्वभाविक है, या यूं कह सकते है कि कही कही तो एक स्त्री के लिए घर भी सुरक्षित नही हैं और ना बाहर। चंद लोगो की विकृत मानसिकता का सामना उसे सड़क पर चलते समय, बसों, ट्रेनों, चौराहों पर, सुनसान स्थानों पर करना पड़ता हैं। और पीड़िताओं को अपने साथ हो रहे अपराधों के लिए एफआईआर दर्ज से लेकर न्याय व्यवस्था तक उसे न्याय की गुहार के लिए सैकड़ो बार मरना पड़ता। क्योकि पीड़ा देने वाला भी विकृत मानसिकता का एक पुरुष भाव ही है और न्याय के लिए प्रतिक्षा कराने वाला भी पुरुष ही है।

आज हम अपने आसपास देखें तो पायेंगे कि महिलाओं के साथ होने वाले दुराचारों का प्रतिशत बढ़ते जा रहा है, इसके कारण को मैं इस रूप में देखती हूँ कि अब महिला उत्पीड़न के मामले तो दर्ज होते है पर उस पर पुलिस प्रशासन की स्त्री अपहरण शीलभंग के मामलों में असंवेदनशीलता व गम्भीर मामले को सहज रूप से लेना भी दूसरा कारण है। पंगु और असहाय हो चले इस समाज की मानसिकता जहां गांव की बेटी की इज्जत अपनी बेटी की इज्जत होती थी। वही अब किसी स्त्री के ऐसे मामलों में उपहासात्मक भाव या भाव शून्यता भी है। 

अब तो पीड़िता की नृशंस हत्या भी एक नई धारणा बलात्कारी अपराधियो की बन गयी है। यदि किसी प्रकार वो बच भी जाती है तो समाज उसे स्वीकार नहीं करता। महिलाओं के साथ बढ़ते अत्याचारों के अपराधी कहां से आते हैं? वो इसी शालीन, चरित्रवान, नैतिकता और मर्यादा का ढ़ोंग करने वाले समाज में से कुछ शराफत का आनावरण लिए हुए होते है या कभी कभी अवयस्क-वयस्क विकृति भारत वर्ष की हर गली, हर चौराहें और हर मोड़ पर, हर पल किसी न किसी स्त्री के साथ सम्भव हो सकता है। जब कुछ मामले तेजी से उठ जाते हैं तो इस समाज का एक वर्ग हाथों में मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर निकल पड़ता है, आत्मा की शांति की प्रार्थना करने के लिए, पर क्या आपको लगता है कि किसी रेप पीड़िता की आत्मा को शांति कुछ मोमबत्तियां जलाने से मिल सकती है या अपराधी को दंडित करने से हो सकती है। पीड़िता के माता-पिता अपनी बेटी के न्याय के लिए गलियों की खाक छानते-छानते हार मानकर एक दिन आंतरिक रूप से मर जाते हैं। अगर इसे न्याय कहा जाता है तो अन्याय क्या है?

मेरा मानना है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था से ज्यादा समाजिक, पारिवारिक व्यवस्था को घुन को लग चुका है। इस व्यवस्था को संभालने के लिए मन मस्तिष्क में स्त्री के प्रति संस्कार व आदर का वास्तविक भाव आपने परिवारों में भरना होगा।
माताएं अपने पुत्रों को भी बेटियों के साथ संस्कारित करें फिर देखिए इस व्यवस्था में स्त्री और पुरुष दोनों कितने सुरक्षित रहते है। निर्भया कांड, बैंगलूर कांड हो, उन्नाव कांड या बरेली कांड हो या फिर वो लाखों कांड जो लोक-लाज, समाज, परिवार और अन्य कारणों से सामने न आ पायें उन सभी कांडों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।रोज जाने कितनी निर्भया अपनी मर्यादा को खोने के बाद, हर पल मर रही हैं, कभी समाज की चुभती निगाहें उनकी हत्या कर रही हैं, कभी न्याय के नाम पर किए जाने वाले कोर्ट में किये जाने वाले सवाल, कभी चतुर, चालाक अपराधी ही उस पर झूठे आरोप लगा कर उसके सम्मान, उसकी मर्यादा को तार तार कर उसकी हत्या कर रहा होता है।

बलात्कार और अनैतिक रिश्तों की शिकार महिला यदि इस सब के बाद अपनी जान गंवा देती है, तो उसे उसके लिए सुखद मौत कहा जा सकता हैं, आप कुछ भी कहें परन्तु यह सच्चाई है कि दुराचार का शिकार होने के बाद कोई स्त्री जीना नहीं चाहती, क्योंकि जिस पुरुष प्रधान समाज ने उसे इस स्थिति में पहुंचाया होता है, वही कभी उसके साथ संवेदना व्यक्त करता है और मौका मिलने पर, मौके का फायदा उठाने से चुकना नहीं चाहता है। यद्यपि महिलाओं के मामले में कई कठोर कानून भी बने है। पर इससे उन महिलाओं की दुश्वरियां जल्द कम नही होती। स्त्री के साथ होते घिनौने दुराचार को आज के सभ्य समाज के लिए कलंक कहा जाए तो गलत नहीं होगा, महिलाओं को आनंद और मनोरंजन का साधन मानने वाले अधिकतर दुराचारी आनंद का जीवन जीते है और शिकार महिला नरक से बदत्तर जीवन काट रही होती है, कुछेक मामलो में तो देखा जाय तो जन्म से लेकर मरण तक विभिन्न सम्बन्धो में जिन स्त्रियों पर पुरुष निर्भर हो अपनी सेवायें लेता है। 

बदलें में वो महिलाओं को उपहार के रुप में दुराचार, बलात्कार देता है, कभी शादी का झांसा देकर स्त्री की मर्यादा भंग करता है, कभी प्रेम जैसे पवित्र रिश्ते की आड़ में अपनी वासना को पूरा करता है और ऐसे भेड़िए अपराध करने के बाद उस स्थान पर नही रुकते वह बल्कि वह जल्द ही अपना मुखौटा बदलकर किसी ओर जगह अपनी मनमानी कर रहा होते है और यह समाज मे दिनप्रति दिन घटित होता है। जिस समाज की स्थिति इतनी भयावह हो वहां महिलाएं कैसे सुरक्षित रह सकती है जहां कुछ लोग आज भी दोहरी मानसिकता और दोहरा व्यक्तित्व का जीवन जी रहे हैं, एक ओर महिलाओं के सम्मान का प्रवचन देते हैं वहीं दूसरी ओर मित्रता की आड़ में वहीं करते है जो एक बलात्कारी किसी अनजान महिला के किसी सुनसान स्थान पर मौका मिलने पर करता है। दोनों के कार्य निंदनीय हैं, जिनके अपराध सामने नहीं आते, उन्हें अधिक शातिर अपराधी मानना चाहिए, क्योंकि वो न जाने कितनी ओर महिलाओं को अपना शिकार बनायेगे या किस दशा को पहुंचायेंगे कहा नहीं जा सकता।
ऐसे में मैं नारी समाज से भी भावनात्मकता त्याग कर बिशेष सतर्कता की अपील करती हूं। स्वयं के प्रति माताएं अपने बच्चीयों के प्रति सदा सावधान रहें किसी के भरोसे को स्वयं पर हावी न होने दें।वें पढ़े बढ़े स्वावलंबी हो पर अत्यधिक सतर्कता के साथ।

                        मीना चौबे 
                सदस्य राज्य महिला आयोग 
                               उ०प्र०
              सम्पादक नारी जागरण पत्रिका