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करगिल विशेष...... नवाज शरीफ का धोखा,परवेज मुशर्रफ का षड़यंत्र और ‘करगिल’
July 25, 2020 • रवि प्रकाश सिंह  • जनसंदेश एक्सक्लूसिव


-बलवान सिंह ने 12 घंटे की पहाड़ी रास्ते की चढ़ाई 
-जब दुश्मन को घेरा, तो पाकिस्तानी सेना के होश उड़ गए
- कैप्टन बत्रा की बात ‘दिल मांगे मोर’ और कालिया  की दिलेरी
रवि प्रकाश सिंह 
वाराणसी। करगिल...... वो युद्ध जिसे भारत के वीर अमर जवानों ने जान देकर देश की आन बान और शान को जिंदा रखा। करगिल को फतह कर हमारे जवानों ने ये साबित कर दिया कि युद्ध की स्थिति चाहे जो भी हो उसे अपनी तरफ मोड़ना ओर विजय प्राप्त करना हमारे लिए चुनौति नहीं बल्कि खेल है। इस युद्ध में एक बात को साबित कर दिया कि पड़ोसी देश पाकिस्तान का भारत से दोस्ती और शांति में कोई दिलचस्पी नहीं है। करगिल युद्ध करीब 60 दिनों तक चली लड़ाई का अंत 26 जुलाई 1999 को हुआ जिसे भारत में कारगिल विजय दिवस के तौर पर मनाया जाता है।
एक तरफ से नवाज शरीफ भारत के साथ गलबहियां का नाटक कर रहे थे तो उसी समय उनका जनहरल परवेज मुशर्रफ की निगाह करगिल पर थी और उसके साथ ही साथ पाकिस्तान की कुर्सी पर थी। करगिल में तो उसे हार खानी पड़ी लेकिन तख्ता पलट के जरिए वो पाकिस्तान की गद्दी पर काबिद हो गया थामई में पहाड़ों की बर्फ पिघल रही थी। लेकिन सेना के तोपों ओर टैंकों ने गरजना शुरू कर दिया था। अंजाम वहीं हुआ जो इसके पूर्व में भारत से भिड़ने पर हुआ। इस युद्ध में एक-एक जवान का बलिदान देश शौर्य दिवस के रूप में मनाता है। कुछ ऐसे नाम जिसने इस युद्ध को अमर कहानियां बना दी। 
कैप्टन विक्रम बत्रा  
‘ये दिल मांगे मोर’ कारगिल की लड़ाई के समय एक पोस्ट पर फतह करने के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा जब अपने कमांडिंग आॅफिसर को वायरलेस के माध्यम से रिपोर्ट दे रहे थे, तो उनके शब्द थे, ‘चाणक्य.....शेर शाह इज रिपोर्टिंग...हमने पोस्ट पर कब्जा कर लिया है। ये दिल मांगे मोरे। मरणोपरांत इस वीर सपूत कैप्टन विक्रम बत्रा को भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।  

 


ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव  
16 साल की उम्र में भारतीय सेना में शामिल होने वाले योगेन्द्र सिंह यादव को कारगिल युद्ध में उनके अदम्य साहस के लिए सबसे कम उम्र में उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान, परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। कारगिल युद्ध में टाइगर हिल के बेहद अहम दुश्मन के तीन बंकर को तबाह करने की जिम्मेदारी योगेन्द्र को सौंपी गई। एक-एक करके उन्होंने बंकर को तबाह किया। योगेंद्र सिंह यादव को सीने पर 5 गोलियां लगीं, लेकिन वो हार नहीं मानें और अपने लक्ष्य को प्राप्त किये।  
लेफ्टिनेंट बलवान सिंह  
टाइगर हिल को पाकिस्तानी सेना के कब्जे से छुड़ाने की जिम्मेदारी जिन लोगों को सौंपी गई थी, उसमें लेफ्टिनेंट बलवान सिंह भी थे। इन्हें घातक प्लाटून की कमान सौंपी गई। 25 साल की उम्र में बलवान सिंह ने 12 घंटे की पहाड़ी रास्ते की चढ़ाई करके जब दुश्मन को घेरा, तो दुश्मन के होश उड़ गए। 

कैप्टन सौरभ कालिया  

23 साल पूरा होने से 20 दिन पहले कैप्टन सौरभ कालिया ने अपना बाकी जीवन अपनी माँ भारत माता के चरणों में समर्पित कर दिया। 4 जाट बटालियन के कैप्टन सौरभ 15 मई को नियमित गश्त के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा जीवित पकड़ लिया गया। पाकिस्तानी सेना ने इस वीर सपूत और उनके साथियों को लगभग 22 दिन तक बंदी बनाकर रखा और कई प्रकार की यातनाएं दीं। हौसला तो देखिए भारत के इस वीर सपूत का कि हजारों दर्द सहने के बाद भी देश के खिलाफ एक लफ्ज नहीं कहा। जब पाकिस्तानियों को उनसे कोई जानकारी नहीं मिली, तो इन सपूतों को बर्बरता पूर्वक मार दिया। 

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा 
कारगिल युद्ध में हमारी वायु सेना ने अहम किरदार निभाया। संघर्ष के अंतिम क्षणों को जीत में बदल दिया। कारगिल की लड़ाई जब शुरू हुई थी तभी आहूजा ने स्क्वाड्रन की कमान संभाली थी। लड़ाई में जाने के लिए उन्होंने तुरंत कमर कस ली. वो मिग-21 उड़ा रहे थे। आसमान से वो पाकिस्तानी सेनाओं को मौत के घाट उतार रहे थे। उनकी इस वीरता को देखकर पाकिस्तानी सेनाओं ने भी जला बिछाया और उनके मिग पर मिसाइल दाग दी। उनका विमान पाकिस्तानी क्षेत्र में गिरा। उनका पार्थिव शरीर 29 मई को देश को सौंपा गया।