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गुरू पूर्णिमा पर बाबासाहब को मिला ‘अम्बेडकर’ सरनेम
July 3, 2020 • डा. दिलीप सिंह • मनोरंजन/लाइफस्टाइल

जनसंदेश न्यूज 
इंदौर। गुरू ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा! अर्थात गुरु ही ब्रह्मा, यानि सृजक, विष्णु यानि पालनहार और शिव यानि संहारक है। यह श्लोक आगे कहता है कि गुरु का स्थान सबसे ऊपर है और मैं पूरे आदर के साथ उनके सामने नतमस्तक हूं। 5 जुलाई को गुरु पूर्णिमा है। यह एक पारंपरिक त्यौहार है, जिसमें शिष्य अपने गुरू को सम्मान देते हैं, उनकी पूजा करते हैं और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। इस दिन को और यादगार बनाने के लिये इस गुरु पूर्णिमा पर आइये, हम शिक्षक कृष्ण केशव आम्बेडर को याद करें, जिन्होंने न केवल सबसे अपवादी नेता डॉ. बी. आर. आम्बेडकर का मार्गदर्शन किया, बल्कि उन्हें अपना सरनेम आम्बेडकर भी दिया। 
अक्सर कहा जाता है कि शिक्षक ही विद्यार्थी के भविष्य को आकार देते हैं। कुछ ही शिक्षक होते हैं, जो बच्चों के प्रति सच्ची भावना, परवाह और चिंता रखते हैं, निस्वार्थ होकर प्रेम और प्रोत्साहन देते हैं। बाबासाहब के जीवन में ऐसे ही प्रेरक और लगन वाले शिक्षक थे उनके गुरूजी कृष्ण केशव आम्बेडकर। 1800 के दशक में भारत की शिक्षा व्यवस्था बदल रही थी और उस समय बाबासाहब अपने स्कूल में चुनौतियों का सामना कर रहे थे। स्कूल की अथॉरिटी और शिक्षक उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। बाबासाहब की मदद करने के लिये उनके गुरूजी ने बड़ा कदम उठाते हुए उन्हें अपना सरनेम आम्बेडकर दिया, ताकि जाति की पहचान से छुटकारा मिल सके। 
बाबासाहब का जन्म से नाम भीमराव रामजी सकपाल था और उनके पिताजी ने स्कूल में उनका नाम भीमराव अम्बाडावेकर लिखवाया था। यह उपनाम रत्नागिरी जिले में स्थित उनके पैतृक गांव अम्बाडावे से लिया गया था। हालांकि स्कूल में उनके गुरुजी कृष्ण केशव आम्बेडकर ने उन्हें अपना सरनेम दिया और फिर वे भीमराव आम्बेडकर कहलाए। बाबासाहब के जीवन में उनके शिक्षक के अतुलनीय योगदान के बारे में एण्डटीवी के एक महानायक डॉ. बी. आर. आम्बेडकर में रामजी सकपाल की भूमिका निभा रहे जगन्नाथ निवानगुणे ने कहा कि शिक्षक को गुरू भी कहा जाता है और वही आपको जीवन की विभिन्न अवस्थाओं का सामना करने के लिये तैयार करता है। 
 बाबासाहब का सौभाग्य था कि उन्हें गुरू के रूप में कृष्ण केशव आम्बेडकर मिले, जिन्होंने नोटिस किया कि बाबासाहब एक अच्छे विद्यार्थी हैं और फिर कॅरियर के लिये उनका मार्गदर्शन किया। बाबासाहब महत्वाकांक्षी थे और ज्यादा से ज्यादा सीखने की इच्छा रखते थे। अन्य विद्यार्थियों द्वारा अच्छा व्यवहार नहीं किये जाने के बावजूद बाबासाहब ने बड़ी गंभीरता और लगन से पढ़ाई की। बाबासाहब की प्रतिभा और ज्यादा से ज्यादा सीखने की भूख से प्रसन्न होकर उनके शिक्षक कृष्ण केशव आम्बेडकर ने उनका सरनेम बदलकर आम्बेडकर रख दिया।एण्डटीवी का एक महानायक डॉ. बी. आर. आम्बेडकर बाबासाहब की प्रेरक गाथा है, जिसमें पांच वर्ष की आयु से लेकर भारतीय संविधान के प्रधान शिल्पकार बनने तक की उनकी यात्रा को दिखाया गया है।