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दिल्ली की पत्रकार वरिष्ठ सुप्रिया शर्मा पर बनारस में एफआईआर के मामले में सीपीजे सख्त
June 19, 2020 • जनसंदेश न्यूज • वाराणसी-चंदौली

बंद होना चाहिए पत्रकारों का उत्पीड़नःआलिया इफ्तिखार

जनसंदेश न्यूज

वाराणसी। समाचार पोर्टल ‘स्क्रोल डॉट इन’ के कार्यकारी संपादक और एडिटर-इन-चीफ के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज किए जाने के मामले में न्यूयॉर्क में एशिया महाद्वीप के लिए कार्यरत कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) की वरिष्ठ शोधकर्ता, आलिया इफ्तिखार ने कहा है कि इस आपराधिक मामले को तत्काल बंद किया जाना चाहिए। साथ ही उन पत्रकारों का कानूनी रूप से उत्पीड़न भी बंद किया जाना चाहिए जो ईमानदारी से अपनी पत्रकारीय जिम्मेदारी का निर्वाहन कर रहे हैं।

सुश्री आलिया ने एक बयान में कहा है कि 13 जून को, वाराणसी की रामनगर थाना पुलिस ने स्क्रॉल.इन न्यूज़ वेबसाइट की कार्यकारी संपादक, सुप्रिया शर्मा पर जो मामला दर्ज किया है उसके मुताबिक़ उनपर एक तरफ मानहानि के आरोप हैं। दूसरी तरफ उन पर लापरवाही बरतने के भी आरोप लगे हैं।  बयान में कहा गया है कि आठ जून को लिखे गए समाचार के अनुसार जांच की गई थी। रिपोर्ट रूपी लेख में यह आरोप लगाया गया था कि डोमरी गांव में कोविड-19 के दौरान हुए लॉकडाउन के दौरान लोग भूखे रह गए थे। उस लेख में केस स्टडी के रूप में उल्लिखित डोमरी गांव की निवासिनी एक स्थानीय महिला माला देवी द्वारा स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि स्क्रॉल.इन ने उसकी टिप्पणी को गलत तरीके से प्रस्तुत किया। समाचार में डोमरी गांव के कई अन्य लोगों से भी बातचीत की गई है, लेकिन आपत्ति सिर्फ माला ने किया है।

आलिया इफ्तिखार ने अपने बयान में यह भी कहा है कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में अपने काम को ईमानदारी से निर्वाह करने के लिये के एक पत्रकार के ऊपर जांच शुरू करना स्पष्ट रूप से डराने की रणनीति है। देश भर के पत्रकारों के लिए यह मामला एक हाड़ कंपा देने वाले संदेश सरीखा है। आलिया ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस को शीघ्र  सुप्रिया शर्मा पर हो रही जांच को बंद कर देना चाहिये।  उन्होंने उक्त समाचार को लिख कर कोई अपराध नहीं किया है और वे केवल एक पत्रकार के रूप में अपना काम कर रही थीं।

स्क्रॉल.इन के अनुसार, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कानून के कथित उल्लंघन के इस मामले के लिये सुप्रिया शर्मा की जांच की जा रही है; यदि उन पर आरोप सिद्ध हो जाते हैं  तो वह जमानत के लिए अयोग्य होंगी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कानून के मामले में दोषी पाये जाने पर उन्हें पांच साल तक की सजा हो सकती है।  मानहानि का दोषी पाये जाने पर, उन्हें दो  वर्ष तक की जेल  और आर्थिक जुर्माना भी हो सकता है।

उधर, स्क्रॉल.इन द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान में यह स्पष्ट किया गया है कि उनका संस्थान सुप्रिया शर्मा द्वारा लिखे गये समाचार के पक्ष में खड़ा है। यह जांच वास्तव में “स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने और चुप करवाने का एक प्रयास है, जो कोविद -19 के दौरान हुए लॉकडाउन के दौरान कमजोर समूहों की स्थितियों पर समाचार एवं लेख लिख रहे हैं।”

सीपीजे ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान भारत में पत्रकारों पर हो रही पुलिस जांच के ढेर सारे अन्य मामलों का भी दस्तावेजीकरण किया है, खास तौर पर उत्तर प्रदेश राज्य में भी, जिसमें वाराणसी भी शामिल है। सीपीजे ने इस मामले पर टिप्पणी करने के लिए वाराणसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को ईमेल भी भेजा है, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।

द वायर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस मामले में वादी माला के फोन नंबर पर कॉल किया तो उनकी छोटी बहन ने फोन उठाया। एफआईआर के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने फोन काटने से पहले हिचकिचाते हुए कहा, ‘आप इस मामले में डीएम सर से बात कीजिए।’ इस बीच जनसंदेश टाइम्स ने भी माला से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उनका पक्ष नहीं मिला। अगर उनका पक्ष मिलता है तो उसे भी प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाएगा।