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'बनारस लॉकडाउन' (कहानियों की सच्ची कहानी)  : इंतजार खत्म, यहां से हासिल करें ई-बुक
July 30, 2020 • विजय विनीत (VjayVineet) • जनसंदेश एक्सक्लूसिव

'बनारस लॉकडाउन'  ई-बुक अमेजान पर उपलब्ध 

लिंक-https://www.amazon.in/dp/B08BZ8RY6H/ref=sr_1_1?dchild=1&keywords=%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%B8+%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%95%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%A8&qid=1593426187&s=books&sr=1-1  

 

लेखकः विजय विनीत' (वरिष्ठ पत्रकार-वाराणसी)

आत्म कथन

सुबह-ए-बनारस जिस रौनक से उतरता था, घंटा-घड़ियाल, ढोल-नगाड़ा और शहनाई सुनाता था, बनारस की वो शाम जिसकी तरंगें आरती से गंगा में प्रवाहित होती थीं, वे मेले और तीज-त्योहार जो दुनिया भर से आने वाले लोगों की हर साध पूरी करते थे-वो लॉकडाउन में उदासी और सन्नाटे से घिर गए। कोरोना की आंधी में बनारस का वो वजूद भी मिट गया जो भोर की झिलमिलाहट में ‘हर-हर महादेव शंभो-काशी विश्वनाथ गंगे’ की गूंज सजाता था। भजन-कीर्तन की ध्वनियां अरुणोदय को आमंत्रण देती थीं। आराधना और भक्तिभाव का संदेश देने वाला बनारस, लॉकडाउन में पूरी तरह खामोश हो गया। बनारस का बना हुआ ‘रस’ चौपट हो गया, अब तो सिर्फ स्मृतियां ही शेष हैं।

कोरोना भगाने के बहाने सरकार ने खूब तमाशा किया। कहीं लोटा-थाली बजवाई, तो कहीं शंख-मजीरा। अंधविश्वास का दीपक भी जलवाया, लेकिन सब बेअसर रहा। इस तरह के तमाम टोटके बनारसियों ने सैकड़ों साल पहल से पेटेंट करा रखे हैं। ‘चलौवा’, ‘उतारा’ और ‘ओझाई’ भी इसी तरह के टोटके हैं। बनारसियों ने इसी तिकड़म से प्लेग, हैजा, चेचक और न जाने कितनी भयंकर बीमारियों को भगाया था। खतरनाक बीमारियां आती थीं तो इस शहर की हर त्रिमुहानी और चौराहे पर फूल-माला, रेक्सहवा कोहड़ा, कागज की पालकी, पान-बतासा, धार, हंडिया-परई सजी मिलती थीं। देहात में गांव गोठाई भी शुरू हो जाया करती थी। यह क्रिया फेल होने पर ‘बाण’ चलाया जाता था, जो ‘रामबाण’ नहीं, ‘दशरथबाण’ से भी ज्यादा असर करता था। कोरोनाकाल में सरकार ने खुद तो टोटके आजमाए, पर बनारसियों को अपना तजुर्बा आजमाने का मौका नहीं दिया। सरकार ने अंधविश्वास का जो पौधा रोपा है, उससे पिछड़े तबके की महिलाएं काफी प्रभावित हैं। ग्रामीण इलाकों में अब कोरोना माई (मां) की पूजा सरोतर होने लगी है।

बनारस लॉकडाउन में संकलित रचनाओं में कोरोनाकाल के संकट की सिर्फ उदासी ही नहीं, काशी की मिट्टी की सुगंध भी है। घंटे-घड़ियाल तो हर जगह बजते हैं, लेकिन जब बनारस में बजते हैं तो उसकी अपनी एक अलग मिठास होती है। यह बनारस ही है, जहां गंगा की धारा उलट गई, आम लंगड़ा हो गया और बात बतरस में बदलकर किस्से-कहावतों में बदल गई। बनारस के ‘गप्प’ में जो मजा है, वो सारे जहां के ‘सच’ में भी नहीं है।

दुनिया जानती है कि बनारस की नागरिकता का आधार कार्ड है गुरु। न कोई सिंह, न पांडे, न जादो, न राम। यहां कोई सर और मिस्टर नहीं होता। बनारस में शख्स ‘राजा’ है और सबके सब गुरु। जो पैदा हुआ वो भी गुरु, जो मर गया वो भी गुरु। ‘राजा’ का मतलब भीगा गमछा, हाथ में दतुवन और दामन में फक्कड़पन। राज की एक बात भी जान लीजिए। बनारस जब सर्टिफिकेट देता है, तभी दुनिया में नया धर्म चलाने के लिए लाइसेंस मिलता है। चाहे वो भगवान बुद्ध हों या कबीर। बनारस के परमिट के बगैर भारत में न कोई धर्म चलता है, न किसी की सियासत में धाक जमती है।  

राजा काश्य ने जब काशी को बसाया था तभी मुनादी करा दी गई थी कि यहां मरने पर सीधे स्वर्ग का टिकट मिलता है। मगर, यह शहर स्वर्ग यात्रा का वेटिंग रूम भर नहीं। बनारसी जहां भी रहता है, बनारस उसके अंदर रहता है। पुराण से भी पुराना है बनारस। जीने का दूसरा नाम है बनारस। प्रेम और संवेदना की एक बारीक धुन है बनारस। यह बनारस वेदों में है और सभी के दिलों में भी। एक वो भी बना-रस है जो केवल बनारस में ही बसता है। 

बनारस लॉकडाउन में इस शहर की संस्कृति, संस्कार और रोमांच पर कोरोना के घात-आघात की कहानियां हैं। प्रवासी श्रमिकों के दर्द सहजता से उकेरे गए हैं, जिसमें कहानियां हैं ‘इनसान’ और ‘इनसानियत’ की। वो कहानियां भी हैं जो बनारस के जन-जीवन की झलक दिखाते हुए घूमती हैं। मुश्किलों में घिरे लोगों की स्थिति को सजीव चित्रण की तरह देखने की कोशिश की गई है।

सपाट बनारसी शैली में लिखी कहानियों में कोविड 19 के हमले की गाथा है। आप एक-एक रचनाएं पढ़ेंगे तो लॉकडाउन में बनारसी खान-पान, मिठाई, भांग-ठंडई, साड़ी, मौजमस्ती पर पड़ने वाले प्रभावों की गहन पड़ताल मिलेगी। साथ ही तथ्यों, आंकड़ों के अलावा विद्वानों से सीधी बातचीत भी है। लॉकडाउन में हमारे लेखों पर बड़े विवाद भी उठे,  लेकिन सच को झूठ के बोझ से नहीं दबाया जा सका। 

विश्वव्यापी महामारी की आंधी में लुप्त होती बनारस की संस्कृति और संस्कार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाना इस पुस्तक का मकसद है। बनारस लाकडाउन सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि दस्तावेज है जो शोधार्थियों के लिए संदर्भ ग्रंथ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बनारस लॉकडाउन में किसी व्यक्ति विशेष, संस्था, या संप्रदाय को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है, बशर्ते आप उसमें जबरन यह बात न खोजें। विश्वास है, लॉकडाउन के दौरान आंखों-देखी यह देश की पहली पुस्तक आपको जरूर पसंद आएगी।

क्या आप बनारस लॉकडाउन पढ़ने के इच्छुक हैैं?  कोरोना काल का लाइव पढ़नेे और देखनेे के लिए 

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विजय विनीत

 @vijayvineet1